मुख्य तौर पर रसोई में मौजूद सफ़ेद जहर

चीनी , नमक , मैदा , वनस्पति घी आदि सफ़ेद जहर हैं | जिस विधि से इन्हें तैयार किया जाता हैं| उससे उनके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं | फिर इन तत्वहीन वस्तुओं के सेवन से शरीर को लाभ की बजाय हानि ही उठानी पड़ती है |

(1) चीनी

चीनी को गन्ने से तैयार करने में इसके उपयोगी व पौष्टिक तत्व (calcium, phosphorus, iron, glucose and many types of  vitamins etc.) समाप्त हो जाते हैं | यह केवल तत्वहीन मिठास है | सफ़ेद चीनी को हम नहीं खाते, बल्कि यह हमें ही खाती है |

चीनी से अनेक रोग :-

नये अनुसंधानों ने यहाँ तक सिद्ध कर दिया है की चीनी को पचाने के लिए और नष्ट हुए तत्वों की पूर्ति के लिए शरीर पर इसका कुप्रभाव पड़ता है | इस विषतुल्य चीनी को खाकर अजीर्ण , पायरिआ , झुकाम , आधा सीसी ( या सर दर्द ) , मधुमेह , चर्म रोग , दन्त – रोग , ह्रदय रोग , गठिया , कोइलिटिस , मोटापा , नाड़ी – दुर्बलता , कैंसर , पेप्टिक अलसर , अधिक गैस बनना , मस्तिष्क- रोग ( मिर्गी आदि ) , पोलियो , दमा , बेरी – बेरी व पैलेगरा – रोग ,, बच्चो का यकृत रोग , हाइपो – ग्लूकेमिया – रोग इत्यादि हो जाते हैं |

2) नमक (sodium chloride)

मनुष्य को नमक की आवश्यकता होती है यह बात सही है , किन्तु पोषण विज्ञान के अनुसार शरीर को प्राकृतिक खाद्यों ( साग – सब्ज़ी , फल , अनाज आदि ) से ही यथोचित मात्रा में खाद्य नमक की प्राप्ति हो जाती है | ऊपर से जो खनिज नमक मिलाया जाता है वह केवल स्वाद या आदत के वश में आकर किया जाता है | यह बाजारी खनिज नमक सजीव नहीं , निर्जीव है | यह हमारे शरीर में घुलता नहीं है |

नमक – प्रयोग के दुष्परिणाम :-

1) इसके अधिक प्रयोग से पाचन – संस्थान की कोमल झिल्लियों में घाव तक हो जाते है |

2) अधिक नमक खाने से प्यास अधिक लगने पर गुर्दे (kidney) का कार्य बढ़ जाता है और उसे क्षति पहुँचती है तथा गुर्दे (kidney) के रोग हो जाते हैं |

3) गुर्दे की क्षमता से अधिक मात्रा में नमक शरीर में पहुँचने पर पैरों के निचले भाग में जमा होकर सूजन एवं दर्द पैदा कर देता है |

4) यह ह्रदय की गति और रक्तचाप को भी बढ़ाता है |

5) इसके प्रयोग से कई व्यक्तियों के बाल शीघ्र गिर जाते हैं या जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं |

6) इसके अधिक सेवन से कैंसर , मोटापा , मधुमेह , झुकाम , अनिद्रा आदि रोग हो सकते हैं |

3) मैदा (All purpose flour)

मैदा तैयार करने में प्राकृतिक लवण , विशेषकर पोटैशियम , कैल्शियम , लोहा , तेल – पदार्थ , ऊँचे दर्जे की प्रोटीन , विटामिन , फुजला आदि नष्ट हो जाते हैं | केवल इसमें निम्न कोटि का स्टार्च और घटिया प्रकार का प्रोटीन बच जाता है | इतना ही नहीं , इसको तैयार करने में शरीर को हानि पहुँचाने और दूसरे वाले रासायनिक द्रव्य इसमें मिलाये जाते हैं |

मैदे के दुष्परिणाम एवं रोग :-

मैदा तो आँतों और नाड़ियों में चिपक जाता है | इससे कब्ज (constipation) होती है जिससे रक्त विकार होता है | इसके प्रयोग से कफ , गैस , सर दर्द एवं जुकाम आदि अनेक रोगों का होना स्वाभाविक है | मैदे की बनी चीज़ें ( डबल रोटी , बिस्कुट , पूरी – कचौरी , समोसे , मिठाइयाँ आदि ) नरम होने के कारण अच्छी तरह चबाई नहीं जाती| इसके फलस्वरूप कम चबाने के कारण पाचन में गड़बड़ी हो जाती है | क्षय , चर्म – रोग , मानसिक विकार आदि के अतिरिक्त कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं | मैदे से प्राप्त अतिरिक्त कैलोरी का भी रक्त – परिभ्रमण – प्रणाली ((blood circulation system) पर विपरीत प्रतिफल पड़ सकता है | छोटे बच्चो को बिस्कुट खिलाने से पेट व् जिगर बिगड़ जाता है और दन्त – रोग हो जाता है |

4 ) वनस्पति घी

बाजार में जो ‘ डालडा ‘ , ‘ पनघट ‘ , ‘ रथ ‘ , ‘ पालकी ‘ आदि ‘ वनस्पति घी ‘ के नाम से बिकता है , वह न तो असली वनस्पति घी है और न ही शुद्ध वनस्पति तेल | वह तो केवल नारियल , मूंगफली , बिनौले आदि के तेल का विकृत रूप है , जिसे घी का रूप देने के लिए निकेल धातु को मिलाकर हाइड्रोजन गैस द्वारा जमा दिया जाता है | इसे जीव – जंतुओं की चर्बी के तेल आदि के नाममात्र के कृत्रिम विटामिनो से विटामिन – युक्त किया जाता है | निकेल धातु तो इसे विषाक्त बना देती है और कृत्रिम विटामिन तो हानिकारक हैं ही | इसे ‘ वनस्पति घी ‘ कहना लोगों को धोखा देना है | यह तो केवल ‘ जमाया हुआ वनस्पति तेल ‘ हैं , जो की पोषक तत्त्व – विहीन विषतुल्य है |

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